Shri Lakshmi Chalisa

< Back to Chalisa Sangrah Last updated: 02-Jan-2017

श्री लक्ष्मी चालीसा

मातु लक्ष्मी करि कृपा । करो हृदय में बास ॥
मनोकामना सिद्ध करि । पुरवहु मेरी आस ॥

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही । ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही ॥
तुम समान नहिं कोइ  उपकारी । सब विधि पुरबहु आस हमारी ॥

जै जै जगत जननी जगदम्बा । सबकी तुमही हो अवलम्बा ॥
तुम ही हो घट-घट की वासी । विनती यही हमारी खासी ॥

जग जननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी ॥
विनवौं नित्य तुमहिं महरानी । कृपा करौ जग जननि भवानी ॥

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी । सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥
कृपा द्रष्टि चितवौ मम ओरी । जग जननी विनती सुन मोरी ॥

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता । संकट हरो हमारी माता ॥
क्षीर सिन्धु जब विष्णु मथायो । चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥

चौदह रत्न में तुम सुख्ररासी । सेवा किंयो  प्रभू बन दासी ॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा । रूप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥
तब तुम प्रगट जनकपुर  माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥

अपनाया तोहि अन्तर्यामी । विष्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहिं आनी । कहँ तक महिमा कहौं बखानी ॥

मन क्रम वचन करै सेवकाई । मन इच्छित वांछित फल पाई ॥
तजि छल कपट और चतुराई । पूजहिं विविध भाँती  मन लाई ॥

और हाल मैं कहौं बिझाई । जो यह पाठ करे मन लाई ॥
ताको कोई कष्ट न होई । मन इच्छित पावै फल सोई ॥

त्राहि-त्राहि जय दुःख निवारिणि । त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि ॥
जो यह पढ़े और पढ़ावै । ध्यान लगाकर सुनै सुनावै ॥

ताको कोइ न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पति पावै ॥
पुत्र हीन और संपत्ति हीना । अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ॥

विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शंका दिल में कभी न लावै ॥
पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै ॥
बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं । उन सम कोइ जग में नाहीं ॥
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई । लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥

करि विश्वास करें व्रत नेमा । होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा ॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी । सब में व्यापित हो गुण खानी ॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं । तुम सम कोउ दयालु कंहू नाहीं ॥
मोहिं अनाथ की सुधि अब लीजै । संकट काटि भक्ति मोहिं दीजै ॥

भूल चूक करि क्षमा हमारी । दर्शन दीजै दशा निहारी ॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी । तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी ॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है मन में । सब जानत हो अपने मन में ॥
रूप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई । ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई ॥

त्राहि-त्राहि दुःख हारिणी, हरो बेगि सब त्रास । जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु का नाश ॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर । मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर ॥