Shri Krishna Chalisa

< Back to Chalisa Sangrah Last updated: 30-Dec-2016

श्री कृष्ण चालीसा

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम॥
अरुणअधर जनु बिम्ब फल, नयन कमल अभिराम॥

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पिताम्बर शुभ साज॥
जय मन मोहन मदन छवि, कृष्ण चन्द्र महाराज॥

जय यदुनन्दन जय जगवंदन । जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के द्रग तारे॥

जय नट-नागर, नाग नथैया। कृष्ण कन्हैय्या धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥

बंशी मधुर अधर धरी टेरी । होवे पूर्ण मनोरथ मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजयंती माला॥

कुण्डल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥

मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पयपान, पुतनहि तारयो। अका बका कागासुर मारयो॥

मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल, लखतहिं नन्दलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई। मसूर धार वारि वर्षाई॥

लगत-लगत व्रज  चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥

दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥

करि गोपिन्ह संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महाअसुर संहारयो। कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥

मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥

भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥

असुर बकासुर आदिक मारयो। भक्तन के तब कष्ट निवारयो॥
दीन सुदामा के दुःख टारयो। तंदुल तीन मूंठी  मुख डारयो॥

प्रेम के साग विदुर घर मांगे। दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखो प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

भारत में पारथ रथ हांके। लिए चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाये। भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये॥

मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा सांप पिटारी। शालिग्राम बने बनवारी॥

निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नन्दलाला। बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥

अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावत नइया ॥
सुन्दरदास आस उर धारी। दया दृष्टि कीजै बनवारी॥

नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥