Shri Ganesh Chalisa

< Back to Chalisa Sangrah Last updated: 21-Dec-2016

श्री गणेश चालीसा

जय गणपति सद्‌ग़ुण सदन | कविवर बदन कृपाल ||
विघ्न हरण मंगल करण | जय जय गिरिजालाल ||

जय जय जय गणपति गणराजू | मंगल भरण करण शुभ काजू ||
जय गजबदन सदन सुखदाता |  विश्‍व विनायका बुद्धि विधाता ||

वक्रतुंड शुचि शुण्ड सुहावना | तिलक त्रिपुंड भाल मन भावन  ||
राजित मणि मुक्ताना उर माला | स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ||

पुस्तक पानी कुठार  त्रिशूलं | मोदक भोग सुगन्धित फूलं ||
सुन्दर पीताम्बर मन साजित | चरण पादुका मुनि मन राजित ||

धनि शिवसुवन शादानना भ्राता | गौरी ललन विश्व-विख्याता ||
ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे | मूषका वाहन सोहत द्वारे ||

कहो जन्म शुभ कथा तुम्हारी | अति शुचि पावन मंगलकारी ||
एक समय गिरिराज कुमारी | पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ||

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा | तब पहुँच्यो तुम धरी द्विज रूपा ||
अतिथि जानि के गौरी सुखारी | बहु विधि सेवा करी तुम्हारी ||

अति प्रसन्न है तुम वरा दीन्हा | मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ||
मिलहि पुत्र तुही बुद्धि विशाला | बिना गर्भ धारण यही काला ||

गणनायक गुण ज्ञान निधाना | पूजित प्रथम रूप भगवाना ||
अस कहि अंतर्ध्यानरूप है | पलना पर बालक स्वरूप हवाई ||

बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना | लखि मुख सुख नहीं गौरी समाना ||
सकल मगन सुखा मंगल गावहिं  | नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं ||

शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं | सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं ||
लखि अति आनंद मंगल साजा | देखन भी आए शनि राजा ||

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं | बालक देखन चाहत नाहीं ||
गिरिजा कछु मन भेद बढायो | उत्सव मोरा न शनि तुहि भायो ||

कहन लगे शनि मन सकुचाई | का करिहौ शिशु मोहि दिखायी ||
नहीं विश्वास उमा उर भयऊ | शनि सों बालक देखन कहयऊ ||

पड़तहीं शनि द्रिग कोण प्रकाशा | बालक सिर उड़ि गयो आकाशा ||
गिरजा गिरी विकल है धरणी | सो दुख दशा गयो नहीं वरर्णी ||

हाहाकार मच्यो कैलाशा | शनि कीन्हों लखी सुत को नाशा ||
तुरत गरुड गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए | कटी चक्र सो गज शिरा लाये ||

बालक के धड़ ऊपर धारयो | प्राण मंत्र पढ़ी शंकर डारयो  ||
नाम गणेशा शम्भु ताब कीन्हे | प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे ||

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा |  पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ||
चले षडानन भरमि भुलाई | रचे बैठी तुम बुद्धि उपाई ||

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें | तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ||
धनि गणेश कही शिव हिये हरषे | नाभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ||

तुम्हारी महिमा बुद्धि बढाई | शेष सहस मुख सके नर गाइ ||
मैं मति हीन मलीन दुखारी | करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी ||

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा | लग प्रयाग ककरा दुर्वासा ||
अब प्रभु दया दीना पर कीजै | अपनी भक्ति शक्ति कुछ दीजै ||

श्री गणेशा यह चालीसा, पाठ करें धर ध्यान l
नीत नव मंगल ग्रह बसे, लहे जगत सनमाना ll
सम्बन्ध अपना सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश l
पूरण चालीसा भयो, मंगला मूर्ती गणेशा ll